ए ज़िंदगी तू बता क्या मजबूरी सी रह गयी
कि साथ चलने की कोशिश अधूरी सी रह गयी
अपने मरकज़ को बयां करने का जो हौसला न था
फ़क़त नज़दीकियाँ आते ही कुछ दूरी सी रह गयी।
शिकवा ए ज़िंदगी का गीत किसको सुनाएं हम
लम्हा लम्हा शब ए ग़म की जी हजूरी सी रह गयी।
ए ज़िंदगी तू बता क्या मजबूरी सी रह गयी
कि साथ चलने की कोशिश अधूरी सी रह गयी
ज़िंदगी की मजबूरी
Sanjay Gupta
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 07/08/2019
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