मुश्किलों से हार कैसी
क्यों न होगी पार कश्ती
लहरों से आज है ठनी
हर हाल होगी पार कश्ती।

समन्दरों की जिद्द अपनी
लहरों की है चाल अपनी
विपरीत हवाएं ही सही
हर हाल होगी पार कश्ती।

चक्रव्यूह सा बना समंदर
हर तरफ प्रलय का मंजर
पतवार नही है फिर भी
हर हाल होगी पार कश्ती।

अंधेरे में पथ सुझता नही
आसमां में इक तारा नही
किनारे ओझल है चहुंओर
हर हाल होगी पार कश्ती।

मुश्किलों से हार कैसी
हर हाल होगी पार कश्ती।