हर पल जिंदगी की दौड़ में शामिल हैं, मगर फिर भी कुछ लम्हें निकाल , एक दूसरे की टांग खींचते मेरे कुछ पागल से दोस्त।
जिस्म से जुदा जुदा हैं, पर दिल से हर वक़्त करते याद हैं,
लड़ने के लिए हर लम्हा तैयार, फिर भी मुश्किल में मेरे हर पल रहते साथ हैं,
उदयपुर की हसीं वादियों में भी बस एक ही कमरे में पूरा दिन और पूरी रैन गुजरती, सारी पुरानी यादों को दोबारा सींचते मेरे कुछ पागल से दोस्त।
ये खुदा शुक्राना तुझे हर बार है, दुआ है तुझसे बस एक यही कि दोबारा जन्म लू जब, हर बार ये सारे पागल ही संग चाहिए,
सवारे जो मेरी जिंदगी, दोस्ती के वो सभी प्यारे से रंग चाहिए,
जीना जिन्होंने फिर से सिखाया है मुझे, बात बात पर मजाक उड़ाते हैं, मगर फिर भी दिल से तारीफ बिखेरते मेरे कुछ पागल से दोस्त।
ढेर सारी तकरार, और दोबारा वही प्यारी सी एक जंग चाहिए,
परवाह ना हो दुनिया - जहां की दोस्ती में डूबी फिर वो जिंदगी मलंग चाहिए।
एक बार फिर जी ले साथ वही दुनिया, जहां हर पल लड़ते , झगड़ते मगर एक दूसरे पर जान छिड़कते मेरे कुछ पागल से दोस्त।
वक़्त के साथ ना बदले कभी अपना अंदाज, कुछ अलग सी ही हर किसी में कोई बात है,
मेरी जिंदगी बस तुम दोस्तो से ही तो अब आबाद है,
हा है हर पल मेरी यादों में आज भी बसते, जगमगाते, मुस्कुराते मेरे कुछ पागल से दोस्त।
मेरे कुछ पागल से दोस्त
Surekha Mali
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 05/18/2020
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