बेसुध पड़ी थी लाश तुम्हारी , मैं बैठा था कोने में ।
डर लगता था भैया तेरे बिना अकेले सोने में ।
कहाँ गए दिन चार हमारे चाय पे चर्चा नीली बत्ती ।
दाल भात चोखा से चलती थी अपने जीवन की कश्ती ।
इलाहाबादी गली मोहल्ले सबकी आँखे भरी हुई थी ।
कमरे में देखा था मैंने लौकी भिन्डी पड़ी हुई थी ।
अदरक वाली चाय की खुश्बू का अभिवादन कौन करे ।
विशेषज्ञ मैं रोटी का था दाल में तड़का कौन भरे ।
इतनी जल्दी हार गए क्यों हमको साहस देते थे ।
डर लगता था तुमको तो क्यों चुपके चुपके रोते थे ।
गर हमको भी बतलाते तो संग में दोनों रो लेते ।
काँटों वाली पगडण्डी पर फूल की क्यारी बो देते ।
फटी सीट साइकिल की मेरी मुझको भी उपहास मिला था ।
तुम्ही अकेले नहीं थे जिसको अपनों से परिहास मिला था ।
शादी का तुम न्यौता दोगे वादे तुमने तोड़ दिए ।
पंखे को वरमाला डाला बाकी रिश्ते छोड़ दिए ।
कहते थे जब लेख तुम्हारी दरबारों में जाएगी ।
जीवन की रंगोली अपनी अखबारों में आएगी ।
हार गए या जीत गए तुम बस इसकी परिचर्चा थी ।
अखबारों के छोटे से हिस्से में तेरी चर्चा थी ।
लौट आओ तुम सुनो दुबारा चावल की गठरी लेकर ।
आँखों में सपने लेकर तुम बाबू की पगरी लेकर ।
लाखों की है भीड़ यहाँ पर सबको कई समस्या है ।
इच्छाओं पर धैर्य का पहरा सबसे बड़ी तपस्या है ।
प्रतियोगी
Dhirendra Panchal
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 10/18/2020
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