ज़िंदगी जिस दयार में गुज़री
एक तेरे इख़्तियार में गुज़री
दौर के कारोबार में न गई
न किसी रोज़गार में गुज़री
कुछ तमन्ना-ए-यार में बीती
कुछ ग़मे बेशुमार में गुज़री
तेरी दहलीज़ तक तो जा पहुंचे
राह गर्दो-ग़ुबार में गुज़री
उम्र जो चैन से गुज़रनी थी
वो तेरे इंतज़ार में गुज़री
ज़िंदगी जिस दयार में गुज़री...
C K Rawat
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 09/01/2019
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