निस्तभ्द अन्धेरा काली राते और समा रुहानी है....
झिलमिल करते तारे झांके , कोहरे की ओठ से..
घूँघट ओढे चाँदनी की, जब झूले चन्दा अम्बर पे...
नजर उतारे बादल भी कारे, बहती पवन के झोखे से...
रात की रानी नृत्य करे जब, झूम उठॆ ब्रज्मन्ड्ल सारा...
देवगन भी मन्त्रमुग्द है, देख रास का द्रिश ये प्यरा...