सोच रहा था खड़ा हुआ रावण का पुतला,
भीड़ बहुत है, लेकिन इसमें राम कहाँ है ?
सोच रहा था खड़ा हुआ रावण का पुतला,
भीड़ बहुत है, लेकिन इसमें राम कहाँ है ?
भीड़ बहुत है लेकिन कोई दिव्य पुरुष तो,
नहीं दिखाई मुझे कहीं पर यहाँ पड़ा है ।
कोई चोर, कोई हत्यारा या फिर कोई
दुष्कर्मों में लिप्त व्यक्ति भी यहाँ खड़ा है ?
क्या इनमें से ही कोई मुझको मारेगा,
खड़े हुए कुछ कन्याओं के काल यहाँ हैं ।
सोच रहा था खड़ा हुआ रावण का पुतला
भीड़ बहुत है लेकिन इसमें राम कहाँ है ।
क्या इनमें से है अधिकार किसी को वध का?
मैंने तो केवल सीता का हरण किया था ?
कोई बताओ उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध हो,
क्या मैंने सीता को बिल्कुल स्पर्श किया था ?
लेकिन जो अबलाओं को हैं आज लूटते ,
ऐसे पाखंडी लोगों का नाम यहाँ है ।
सोच रहा था खड़ा हुआ रावण का पुतला
भीड़ बहुत है लेकिन इसमें राम कहाँ है ?
तभी एक नेताजी लाए धनुष हाथ में,
बने राम वे, और लक्ष्य था केवल रावण ।
कल ही छूटे कई दिनों के बाद जेल से,
अबलाओं का चीर हरण करना था कारण ।
रावण बोला ये भी क्या मुझको मारेगा,
मैं खुद जल जाता हूँ, मेरा क्या काम यहाँ है ?
रावण के पुतले को हम हर साल जलाते,
उन दुष्कर्मी लोगों को इक बार जलाओ ।
पाप, अधर्म, अनीति के विरुद्ध हो लड़ते,
लेकिन उससे पहले पुण्य धर्म तो लाओ ।।
जहाँ कभी तो सूरज अपने यौवन पर था,
धीरे-धीरे प्रतिपल होतो शाम यहाँ है ।
कैसे फ़िर से भारत में हो सूर्य नवोदित,
नहीं दिखा है मुझे अभी तक, राम कहाँ है !
सोच रहा था ......
— सूर्य प्रकाश शर्मा
रावण का पुतला
Surya Prakash Sharma
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 10/24/2023
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