फीके पड़े प्रेम के रंग , फीके पड़े प्रेम के रंग ।
जगह-जगह पर छिड़ी हुई है , इंसानों में ज़ंग।।
फीके पड़े ...
कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम, कोई सिख, ईसाई है ।
कोई बसपा वाला, कोई सपा, कोई भाजपाई है।
जाति-जाति का शोर सुनाई देता है सब ओर मुझे।
'हमीं श्रेष्ठ हैं' इस कारण होती सब जगह लड़ाई है।
तोड़ दिया हैं नाता सबने, मानवता के संग ।
फीके पड़े प्रेम के रंग, फीके पड़े प्रेम के रंग।।
जनता भटक रही है भूखी, महँगाई बाज़ारों में।
सभी मिनिस्टर घूम रहे हैं, लम्बी-चौड़ी कारों में।
बस चुनाव में ही गरीब के आँसू पोंछे जाते हैं ,
फ़िर गरीब की पीड़ा बस, रह जाती है अखबारो में।
नेताओं की मक्कारी से भारत की जनता तंग ।
फीके पड़े प्रेम के रंग, फीके पड़े प्रेम के रंग ।।
इस होली में सभी मित्रज़न दम्भ व द्वेष जलाओ।
जाति-धर्म व दल के कारण, मत मतभेद बढ़ाओ।
पहले हम सब मानव हैं, ये विचार लाओ तुम,
सभी प्रेम का रंग लगाकर, सबको लगाओ ।
लेकर के गुजिया, ठंडाई , पीयो प्रेम की भंग ।
लगाओ सभी प्रेम का रंग, लगाओ सभी प्रेम का रंग।।
— सूर्या
होली के रंग
Surya Prakash Sharma
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 03/03/2023
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