गर मेरी याद आए ,तुम वापस मत आना
गर पुरानी बात सताए ,तुम वापस मत आना
भूल चुका हुँ मैं तुमको
गर मुझको ना भुला पाए ,तुम वापस मत
भुल चुका हुं तुमको
पर तुम्हारे साथ बिताए , हर वो पल याद हैं मुझे
अपना बीता सुनहरा पल, याद है मुझे,
पर इन यादों का मैं क्या करूं
दिल में घेरा बनाए बैठे हैं
क्या कसूर था मेरा
ये सवाल उठाए बैठेे हैं
कि वो जब तुम मेरी चाहत बन गयी थी
आँखों को मेरी राहत बन गयी थी
कहती थी मैं बस तुम्हारी हुँ
तुम ही मेरी आदत बन गयी थी
मगर इस आदत का छुटना भी जरूरी था
प्रेम का घड़ा , जो भर गया था
उसका फूटना भी जरूरी था
बेवफा तुम भी ना थी
कसूर मेरा भी न था
लकीरों में जो लिखा है
उसे तो होना ही था , पर
अब खाली खाली सा लगता है दिल
जबसे तुम गयी हो
एक सूखी डाली सा लगता है दिल
अब इस डाली पे फुल कभी खिलेंगे नहीं
ये नजरें अब किसी से मिलेंगे नहीं
मिलना - बिछड़ना तो , किश्मत का लेखा है
कौन किसका होगा , किसने देखा है
अब जुदा हुए तो हुए
इन बातों को तुम ख्यालों में मत लाना
गर मेरी याद आए , तुम वापस मत आना ।।
वापस मत आना
Sunil Pandey
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 05/05/2020
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