भारत माँ की पीड़ा गाने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
मखमल के गद्दे हैं मिलते चाटुकार गद्दारों को ।
कड़ी सुरक्षा मिलती देखो दारू व ठेकेदारों को ।
मजलूमों के दर्द सुनाने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
माँ रोती है भूखे बच्चे की कोई जुगत लगाती है ।
ईंट के भट्ठे कल कारखाने में वो खटने जाती है ।
खुद की थाली रोज सजाने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
जिस देश में अन्तर्मन से बिलख रहे नवजात ।
लगता घोर प्रभंजन वाली होगी फिर बरसात ।
एक सांस में मानस रटने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
पेट की अग्नि सह जाते हैं ऐसे कुछ किरदार ।
सबको अमृत बाटेंगे हम कहता है अखबार ।
खुद को राम - रहीम बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
बौने हैं किरदार तुम्हारे बौने सब आयाम ।
भूखे पेट सिखाता सबको करना प्राणायाम ।
आसमान से फूल गिराने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
दरबारों में कलम बेंच दी शर्म नहीं फनकारों को ।
निद्रा कैसे आती होगी दिल्ली के सरदारों को ।
देश बेंचकर देश बचाने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।
मैं भी चौकीदार
Dhirendra Panchal
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 09/06/2020
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