बागों में अब फूल कहाँ हैं , तोड़ लिए सब माली ने ।
एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।
तेरा मंदिर तुझे सलामत मैं भौरा आवारा हूँ ।
इकलौता श्रृंगार मैं उसका फिरता मारा मारा हूँ ।
वफ़ा कहूँ या खता मैं उसकी छीन लिए स्वर माली ने ।
एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।
पत्थर की मूरत में बेशक हृदय नहीं हो सकता है ।
जिसने मेरा मरम ना जाना हरि नहीं हो सकता है ।
उड़ने की ख्वाहिश थी संग संग काट लिए पर माली ने ।
एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।
बाग बगीचों की पीड़ा का तनिक ना तुमको भान हुआ ।
बिन राधा के मोहन का वो हर लम्हा बेजान हुआ ।
तड़प रहा हूँ सांसों के बिन छीन लिए धड़ माली ने ।
एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।
बागों में अब फूल कहाँ हैं , तोड़ लिए सब माली ने ।
एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।
लूट लिए घर माली ने
Dhirendra Panchal
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 09/22/2020
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