इश्क पर तुम किताबें लिखे जा रहे हो ।
मशवरा है मेरा इश्क करना नहीं ।
दर्द कागज पे अपने लिखे जा रहे हो ।
मशवरा है मेरा दर्द कहना नहीं ।
मुस्कुराने की उनकी अदब देखिए तो ।
देखकर यूँ ही खुद से फिसलना नहीं ।
लाख कह लें तुम्हें , तुम हो मेरे लिए ।
मुस्कुराकर कभी सर झुकाना नहीं ।
चाँद तारों की बातें वो बेशक करें ।
अपने अंजुली पे सूरज उठाना नहीं ।
हमसफ़र हैं वो बस कुछ सफर के लिए ।
हर सफर अपने दिल को जलाना नहीं ।
बह रही है हवा मौसमी चारों ओर ।
इन हवा में दुपट्टा उड़ाना नहीं ।
हैं फिसलती निगाहें जमीं पे यहाँ ।
पांव कीचड़ से अपने सजाना नहीं ।
जब भी बारिश की बूंदे भींगाए तुम्हें ।
रो कर आँखों का पानी छिपाना नहीं ।
हो मोहब्बत तनिक इस धरा से तुम्हें ।
कड़कड़ाती बिजलियाँ गिराना नहीं ।
भेजता हूँ बता क्या रजा है तेरी ।
चिट्ठियों का भी अब तो जमाना नहीं ।
तोड़ दो तुम भले उस कलम की जुबां ।
कोरे कागज पे गुस्सा दिखाना नहीं ।
इश्क पर तुम किताबें लिखे जा रहे हो ।
मशवरा है मेरा इश्क करना नहीं ।
✍ धीरेन्द्र पांचाल
इश्क़ करना नहीं
Dhirendra Panchal
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 08/09/2020
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About इश्क़ करना नहीं
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