ये बारिश जब अति हे
सौंधी सौंधी महक मिट्टी की
मन को भाजति हे
चाये के चुस्की के साथ
गिरती बूंदों को निहारने मैं
कितना मज़ा आता हे सावन के महीने मैं
ये रिमझिम बूंदे तन को भिगोये जाते हैँ
मस्त मगन होकर मोर भी नृत्य मैं लीन होजाता हे
दूर कहीं जैसे कोई मेघ मल्हार सुनाता हे
ये बारिश तो दिल मैं अगन लगाती हे
रह रह कर प्रियतम की याद दिलाती हे
प्यासी धरती की प्यास बुझाने
आती हे बारिश हमें भिगोने