जज्बातों का कोई कद्र नही
इस बेरंगी सी दुनिया में
अब अर्ज करें क्या महफ़िल से
जब हम जैसों का कोई नहीं

किस्मत तो खुदा की लिखावट है
हम इस पर कैसे गौर करें
अब लिख ही दिया तक़दीरों में
तो देख - देख कर आंहें भरें

हम नील गगन के पंछी है
जाने क्यों हम बेरंगी है
हम आज परिंदा बन बैठे
लेकिन कल को बेगाने है

हम दर्द छिपाए बैठे है
इन अनजानी सी महफ़िल में
अपना ही नहीं कोई भी यहां
अब किससे अपना अर्ज़ करें