देख झमाझम बारिश को धरती माता की प्यास बुझी*
ख़िले किसानों के चेहरे , आशाओं की है आस जगी*
झूम रहे बच्चे मस्ती में , झूम रही हर डाली है*
सारे पंछी झूम उठे , छाई ऐसी हरियाली है*
बारिश से हैं भीग गए , जो भीगे कभी पसीने से*
पत्तों से आवाज़ निकलती शायद इसी महीने से*
आसमान का घोर अँधेरा धरा पे छाने वाला है*
बारिश की रिमझिम फुहार से मौसम हुआ निराला है*
माँ के हाथों आज पकौड़ी चाय बनाई जाएँगी*
फुर्सत को लेकर बारिश की बूँदे घर में आएँगी*
आँगन में इक ईंट लगाकर बच्चे नाव चलाएंगे*
शहर डूबता बारिश में लेकिन सब गाँव नहाएंगे*
भेदभाव के बिना बरसना यह बारिश सिखलाती है*
शाँत रहो चित ठंडा रखो , प्रेम का पथ दिखलाती है*
बारिश
Rupesh Dixit
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 07/14/2019
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