पक्षियों का चहचहाना,
मधुर ध्वनि सुनाना,
बैठकर उड़ जाना,
मन को है हर्षाता।
फैले हुए अंधेरे का,
धीरे धीरे से जाना,
और चुपके चुपके से,
रोशनी का आ जाना,
मन को है हर्षाता।
लाल गोलाकार,अद्भुत चमत्कार
रोशनी के रथ में होके सवार,
सूरज का आ जाना,
मन को है हर्षाता।
सूरज का आवागमन,
चंद्रमा पर आक्रमण,
दोनों का दिख जाना,
फिर चांद का छुप जाना,
मन को है हर्षाता।
हवा की ठंडक,
सूरज के गर्माहट,
दोनों का एक साथ छू जाना,
मन को है हर्षाता।
सूरज कैसे है आता?
यह हवा कैसे खुशबू फैलाता?
पक्षियों कैसे हैं उड़ती?
हवा से क्यों नहीं गिरती?
ऐसे अनेक सवाल मन में आ जाता,
मन को है हर्षाता।
गीले घास पर मेरे पाओं का पढ़ना,
और मेरा मंद मुस्कुराना,
ओस में किरणों का पढ़ना,
और उनका चमकना,
मन को है हर्षाता।
अचानक तितली का आ जाना,
अपना सुंदर रूप दिखाना,
फूल पर बैठ जाना,
फिर झटपट उड़ जाना
मन को है हर्षाता।
हरियाली के चादर पर,
फूल रंग बिरंग,
उनमें पक्षियों के,
चहचहाने की उमंग,
बहती हवा के तरंग,
मन को है हर्षाता।
प्रकृति का यह अलौकिक सौंदर्य,
रोम रोम हर्षिता,
मन को तृप्त कर जाता,
और मैं इसमें खो जाता।
प्रातः काल की वेला
Gopal Krishnan
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 06/24/2020
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