वक़्त का खेल है समझिएगा
लड़खड़ा जाइएगा बचिएगा
इक क़दम फूल इक क़दम काँटे
होशियारी से पाँव रखिएगा
काँच का फ़र्श मोम की छत है
दिल में बा-एहतियात रहिएगा
उनसे वादा वफ़ा नहीं होगा
मत ग़लत-फ़हमी पाल रखिएगा
आप में इक अथाह सागर है
सतह पर ही न बहते रहिएगा
-चन्द्रकान्त