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तुझको लिखूं की मैं खुद को संवारू

Dhirendra Panchal

तुझको लिखूं की मैं खुद को संवारू
कागज पर तुझको मैं कैसे उतारू

वो ऑंखें वो बिंदी वो होठों की लाली
वो घूँघराले कुंतल बड़े नैन वाली

वो चेहरे की रौनक़ थी बातें जो मीठी
उसका आलिंगन था जैसे अंगीठी

वादे पर वादा किया मैंने ज्यादा
था मेरा इरादा ना उसका इरादा

उसकी छुअन जैसे शीतल हवाएँ
जैसे ठहरती हों चारों दिशाएं

काजल को उसके था स्याही बनाया
लिखा जी भर कर मैं उसको मनाया

वो रूठी है अब तक है मुझको पता
क्या लिखना ही गलती है मेरी बता

पन्ने भी कहते हैं बस कर ना भाई
अब जाने भी दे छोड़ उसकी बड़ाई

मौत भी मुझको उसी दिन आएगी
कलम मेरी जिस दिन लड़खड़ायेगी

~ धीरेन्द्र पांचाल

(C) Dhirendra Panchal
02/22/2025


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