Naari Janam
पुछ रही एक नारी सबसे...
कौन हु मैं ,
पहचान मेरी क्या...
जिस घर मैने जनम लिया,
मायका कहलता है...
शादी कर जिस घर गयी,
कहलाता ससुराल है...
पुछ रही एक नारी रब से,
क्यो जीवन की पारी को तुने,
दो हिस्सो में बाँटा है...
पहला किरदार बेटी ने,
दुजा बहु ने निभाया है...
कहने को दो घर दिये,
अपना किसे बताउ मै..
अपना समझ के किस घर को अब,
हक़ उसपे जतलाउ मै...
पुछ रही एक लड़की माँ से????
बच्पन से तू कहती है,
बेटी पराया धन होती है...
पर ससुराल मे सासु माँ तो,
दुजे घर की मुझे कहती है....
जाउ कहा अब तू बतला दे,
किसको अपना घर बतलाउ...
या वापस जाकर अम्बर पे,
तारे बनकर झिल्मिलाउ....
Sweta Rateria
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 01/27/2019
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