आज देश में इंसानियत की लाश ...

आज देश में इंसानियत की लाश
एक कोने में पड़ी सड़ रही है ।
नेता लगातार जनता को
आपस में लड़ा रहे हैं,
और बेवकूफ़ जनता –
आपस में लड़ रही है ।।

जैसे एक बंदर —
दो बिल्लियों की लड़ाई में
उनकी रोटी खा जाता है
वैसे ही जनता रूपी बिल्ली की लड़ाई के बीच
बंदर रूपी नेता आ जाता है।

अगर जीवित रहना है,
तो सबसे पहले —
आपस में लड़ना छोड़ दो
और जिस कड़ी से नेता तुमसे जुड़ा हुआ है
उस कड़ी को तोड़ दो ।

ऐसे इंसान से नाता रखना घातक है
जिसकी आँखों के सामने
देश का आम आदमी सड़ता रहे
और वो उस लाश पर पर्दा डालकर
हास्य और श्रृंगार की कविता ‐
पढ़ता रहे ।।

Surya Prakash Sharma
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 05/21/2023 The copyright of the poems published here are belong to their poets. Internetpoem.com is a non-profit poetry portal. All information in here has been published only for educational and informational purposes.