आधुनिक हिन्दुस्तान

मुफ़्त राशन माँगने की पंक्ति में बूढ़ा मिला,
नाम पूछा उससे तो बोला कि ‘हिन्दुस्तान’ है ।

अपने घर में ही उसे रोटी मयस्सर हैं नहीं ,
तभी लम्बी पंक्तियों में लगा वो इंसान है ।

वो अठहत्तर साल का है अजनबी – सा घूमता,
उसकी हत्या करने की साज़िश में कुछ शैतान हैं ।

उसके बेटों ने नहीं उसको दिए कपड़े तलक,
अर्द्ध नंगा, फटे कपड़ों में है वो परेशान है ।

उसके बेटे ऐश करते, उसकी ही संपत्ति पर,
अपनी ही संपत्ति से वो बेदखल, हैरान है ।

अपनी ऐसी दुर्दशा का दुःख उसे उतना नहीं,
जितना अपने चार पुत्रों की कलह से म्लान है ।

उसके पुत्रों की निरंतर, हो रही है अवनति ,
वो सभी उस ‘फूट वाली चाल’ से अनजान हैं ।

घर से कोसों दूर बूढ़ा बैठा है माथा पकड़ ,
उससे थोड़ी दूर पर ही, शहर का श्मशान है ।

— सूर्या

Surya Prakash Sharma
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 02/05/2024 The copyright of the poems published here are belong to their poets. Internetpoem.com is a non-profit poetry portal. All information in here has been published only for educational and informational purposes.