Galat Kon

ना खता तुजसे हुयी है

ना खता मुझसे हुयी है

हम पास आने वाले ही थे की

ये अचानक से दूरियां क्यों बढ़ गयी है

ना गलती तुम्हारी है

ना गलती मेरी है गलती तो बस

ना समझी की है

ना मैं तुम्हे समझ पाया

ना तू मुझे समझ पायी

और न ही हमारे करीबी

हम दोनों को समझ पाए

तो मैं फिर ये कहता हूँ

जो कदम हमने रोक लिए थे आगे बढ़ाने से

क्या फिर हम वही कदम बढ़ाये

एक दूसरे से मिलने को

मेरे पास एक दर्द है

जिसकी दवा सिर्फ तुम ही हो

इसमें किसी की भी गलती नहीं है

ना खता तुजसे हुयी है

ना खता मुझसे हुयी है

हम पास आने वाले ही थे की

ये अचानक से दूरियां क्यों बढ़ गयी है

हम एक दूसरे को समझ चुके थे

मैं तुम्हे पूरा करता और तुम मुझे

दुसरो को क्या फरक पड़ता है

फ़र्क़ तो हमें पड़ना चाहिए

ना जाने क्यों

दूसरों की मर्ज़ी जरूरी लगने लगी

सही तो सब होते है

इन सब मैं ,

मैं और तुम भी

गलत तो कोई है ही नहीं

फिर मैं और तुम क्यों गलत है

तो फिर सब गलत क्यों एक दूसरे को बोल रहे है

मैं फिर कहता हूँ ना खता तुजसे हुयी है

ना खता मुझसे हुयी है

हम पास आने वाले ही थे की

ये अचानक से दूरियां क्यों बढ़ गयी है

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Anand Pahan
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 05/09/2019 The copyright of the poems published here are belong to their poets. Internetpoem.com is a non-profit poetry portal. All information in here has been published only for educational and informational purposes.