*सफर-ए-आजादी*
सफऱ-ए-आजादी*
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आर्यवर्त के महापुरुषों ने,
इतिहास अमर कर डाला
वीरों की गाथा कैसे भूलें,
सूली पर खुदको चढ़ा डाला।
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जश्न ये आजादी का,
जिसके बलबूते हम मना रहे,
इंकलाब जयहिंद के नारों से,
नया कीर्तिमान तब रचडाला।
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ओ वीर सपूतों की आहुति,
किस्से जलिया वाले बाग़,
कड़ी तपस्या-कठोर काराग्रह,
हसते हसते सबकुछ सह डाला।
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किया न्याछावर प्राण भी अपने,
आजादी का परचम लहराया,
खून बहाकर हिंद की खातिर,
दिव्य दीप जला डाला।
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मिली विरासत बलिदानों से,
नमन हृदय से करते है,
आजादी के रखवालों ने
आजाद हिंद को कर डाला।
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कितनी सुनी हुई कलाई,
कितने बेटे कुर्बान हुए,
कितनी मांगे सुनी हो गयी,
छाती पर सब बल रख डाला,
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बड़ा पराक्रम देश का अपने,
नित नए आयाम लिखे,
खून की श्याही से वीरों नें,
चमन का रंग बदल डाला।
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सोने की चिड़िया,
मुक्त गगन में अब फिरसे बलखाती है
नभ-जल-छितिज और धरातल,
डंका चहूं ओर बजा डाला।
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क्या भारत की तस्वीरें बदली,
हर क्षेत्र विकास की हवा चली,
अधूनिकता के नए इरादों से,
अद्वितीय भारत को भर डाला।
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भिन्न जातियाँ भिन्न संस्कृति,
पर हिंदूवादी हरेक यहाँ,
हिंदी बोली की मधुर धारा से,
सराबोर सबको कर डाला।
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जल की धारा बहती कल कल,
पंछियो का चहचहाना क्या खूब यहाँ,
मधुर सन्गित से हरदम सजता भारत,
हर ख्वाब हकीकत कर डाला।।
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जय हिंद का नारा अमर रहे,
वन्दे मातरम का बिगुल बजे,
भारत माता के गूंजे जयकारे,
वीरों ने नस नस में भर डाला।।
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सतीश *मुशाफिर*
कवि - सतीश सेन बालघाटी।
7722884912
Satish Sen Balaghati
(C) All Rights Reserved. Poem Submitted on 08/13/2024
Poet's note: गजब
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